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आरक्षण नीति की समीक्षा में बुराई क्या है?

समीक्षा का अर्थ आरक्षण व्यवस्था की समाप्ति की सोच ही क्यों निकाल लिया जाता है? समीक्षा के आधार पर आरक्षण नीति को अधिक कारगर और व्यावहारिक भी तो बनाया जा सकता है। हैरत की बात है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण खत्म करने की बात ही नहीं कही थी बल्कि इसे असल जरूरतमंदों तक पहुंचाने की जरूरत बतायी थी। उन्होंने अगर यह कहा कि इसे राजनीतिक हथकंडे में नहीं बदला जाए तो क्या गलत कहा!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण नीति की समीक्षा संबंधी विचारों पर तीव्र राजनीतिक प्रतिक्रिया बताती है कि कभी सामाजिक-आर्थिक कल्याण के उद्देश्य से शुरू यह व्यवस्था अब पूरी तरह राजनीतिक मुद्दा बन गयी है। शायद इसीलिए एक बेहद स्वाभाविक और तर्कसम्मत सवाल नजरअंदाज कर दिया गया है। आखिर आरक्षण नीति की समीक्षा में बुराई क्या है? कमोबेश हर सरकारी नीति की समय-समय पर समीक्षा की जाती है। उसी से उसमें सुधार-संशोधन का मार्ग प्रशस्त होता है। समीक्षा का अर्थ आरक्षण व्यवस्था की समाप्ति की सोच ही क्यों निकाल लिया जाता है? समीक्षा के आधार पर आरक्षण नीति को अधिक कारगर और व्यावहारिक भी तो बनाया जा सकता है। यह बात लगातार महसूस की जाती रही है कि जरूरतमंदों तक इसका वांछित लाभ अभी तक नहीं पहुंच पाया है। इसलिए आरक्षण पाने वाले और इसके अन्य हकदार वर्गों के भी हित में होगा कि दशकों से जारी आरक्षण नीति की खुले दिलो-दिमाग से समीक्षा की जाये।हैरत की बात है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण खत्म करने की बात ही नहीं कही थी बल्कि इसे असल जरूरतमंदों तक पहुंचाने की जरूरत बतायी थी। उन्होंने अगर यह कहा कि इसे राजनीतिक हथकंडे में नहीं बदला जाए तो क्या गलत कहा! आरक्षण संविधान द्वारा दिया गया विशेष अधिकार है जो एक निश्चित लक्ष्य के लिए अस्थायी व्यवस्था है। लेकिन इस विशेषाधिकार को अगर सत्ता पाने के लिए एक स्थायी वोट बैंक में बदलने की कोशिश की जाए तो क्या यह अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएगी! व्यवहार में देखा जा रहा है कि दलितों और पिछड़ों की मुख्यधारा आज भी इस विशेषाधिकार का लाभ नहीं उठा पा रही है क्योंकि उन्हीं के बीच का संपन्न तबका इस पर काबिज हो जाता है।

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी संविधान में एक समय-सीमा के अंतर्गत आरक्षण लागू करने की बात कही थी। जो पिछले 68 वर्षों में कम होने के बजाए बढ़ गया। दुख की बात यह है कि आज भी अनुसूचित जाति, जनजाति के लोग आरक्षण मिलने के बाद भी अन्य जातियों के मुकाबले बेहद खराब परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रहे हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यदि स्वतंत्रता के 68 वर्षों के बाद भी कोई समुदाय शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है तो उसके कारणों की विवेचना भी की जानी चाहिए। आरक्षण के प्रति असंतोष अब ऊंची जाति में भी तेजी से बढ़ रहा है। कम आय वर्ग के ऊंची जाति के अनेक योग्य उम्मीदवार आरक्षण की सबसे अधिक मार झेल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी यह प्रश्न उठा चुका है कि क्रीमी लेयर को आरक्षण की क्या आवश्यकता है?

आजाद भारत के संविधान में कुछ जातीय समूहों को अनुसूचित जाति, तो कुछ को अनुसूचित जनजातियों के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों को भारतीय समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं मिला था, इसलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में इनकी हिस्सेदारी भी कम रही। संविधान ने सरकारी  क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों  के लिए क्रमशः 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत का आरक्षण रखा था, जो दस वर्षों के लिए था। उसके बाद हालातों की समीक्षा की जानी थी। इसकी समीक्षा आज तक नहीं हुई, बल्कि समय गुजरने के साथ आरक्षण का दायरा बढाया ही गया। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने शासनकाल में अति-पिछडों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दे दिया। भारत की वर्तमान केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों के दाखिलों में पिछडों को 27 फीसदी आरक्षण दिया है। आरक्षण के मामले में राज्यों ने अपने-अपने राजनीतिक हितों के हिसाब से अलग मनमानी की है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50 फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता है, पर तमिलनाडु में यह आरक्षण 69 फीसदी तक है। तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि कई और राज्यों ने भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आरक्षण सीमा का उल्लंघन कर दिया है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में तमाम मुकदमे भी चल रहे हैं।

कुल मिलाकर आरक्षण जिस रूप में आज चल रहा है, वह संविधान की सामाजिक न्याय की अवधारणा के विपरीत है, क्योंकि वह वोट बैंक की राजनीति से जुड गया है। तब स्वाभाविक यह भी है कि नए-नए वर्ग आरक्षण की मांग लेकर मैदान में आएंगे। भारत का चर्च नेतृत्व  मसीहियत की शरण में आये लोगों के लिए जाति के आधार पर संविधान संशोधन करने की मांग कर रहा हैवह अपने गरीब अनुयायियों के लिए सरकार से अनुसूचित जाति के दर्जे की मांग कर रहा हैआज भारत के चर्च के पास इतने संसाधन हैं कि देश के कई उद्योगपति मिलकर भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते, देश में चर्च के पास बड़ी संख्या में चल-अचल संपति है उसके पास हजारों शैक्षिक संस्थान, स्कूल, काॅलेज अस्पताल, सामाजिक संगठन हैंमसीहियत की शरण में आये लोगों की स्थिति सुधारने के बजाय चर्च नेतृत्व इस समास्या का समाधान सिर्फ जाति आधारित आरक्षण (रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पोर्ट) में ढूंढ रहा है। ईसाई नेता फ्रांसिस ने पूछा है कि वह यह बताये कि ”दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों में शामिल कर लेने से उनके साथ ”ईसाइयत” के अंदर होने वाले भेदभाव एवं उत्पीड़न कैसे रुक पायेगें ? आज नेतृत्वकारी, संपन्न, प्रभावशाली हैसियत वाले वर्ग आरक्षण की मांग कर रहे है यह स्थिति आरक्षण के राजनीतिक इस्तेमाल के खतरों को भी दिखाती है। अब समय आ गया है कि आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय बहस और आरक्षण की बदलते दौर में उसकी खामियों के साथ निरपेक्ष समीक्षा होनी चाहिए।

इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता एक मजबूत राष्ट्र के लिए उन जाति और समाजों को मजबूत करना होगा जो सदियों से आर्थिक और सामाजिक सम्मान से महरूम हैं। ग्रामीण भारत में आज भी वंचित और शोषित समुदायों के साथ शोषण होता है। साथ में यह भी सच है कि पिछड़ों के आरक्षण के नाम पर ऐसी जातियां आरक्षण का लाभ ले रही हैं जो सामाजिक और आर्थिक हैसियत से सामान्य जातियों के ही समकक्ष हैं। साधन और शक्ति संपन्न लोग ही आरक्षण का लाभ लेने में लगे हुए हैं। वोट बैंक के लिए आरक्षण की राजनीति आधुनिक भारत के लिए नासूर बन चुकी है। इस समस्या का सम्मानजनक हल निकालना ही होगा।

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