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सेकुलर जमात के निशाने पर – संघ

देश में फिर एक बार ऐसी स्थिति बनाई जा रही है, मानो सांप्रदायिकता में समाज उबल रहा है, और कुछ सेक्युलर देवदूत उसको बचाने के लिए अपनी बलि चढ़ाने तक को तैयार हैं। क्या वाकई ऐसी स्थिति है? इस माहौल से परे जरा अपने आसपास नजर दौड़ाइए। क्या वाकई ऐसा ही है? जो उत्तर होगा वही सच्ची स्थिति का द्योतक होगा। सच यही है कि ऐसा वातावरण देश में नहीं है।

पिछले सवा साल में देश की राजनीति में भाजपा विरोधी पार्टियों का निशाना बदल गया है। अब वे भाजपा से ज्यादा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर हमले कर रहे हैं। या तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया जा रहा है या आरएसएस पर हमला किया जा रहा है। विपक्षी पार्टियों ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण नीति की समीक्षा संबंधी तीव्र राजनीतिक प्रतिक्रिया, शिक्षा नीति से लेकर संस्कृति के प्रचार-प्रसार, मांस पर पाबंदी को लेकर सेकुलर राजनीति करने वाली पार्टियां आरएसएस पर हमला कर रही है। बिहार चुनाव के प्रचार में लालू प्रसाद रोज आरएसएस के ऊपर हमला कर रहे हैं। असादुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, चर्च नेतृत्व और सेकुलर जमात का यह हल्ला स्थाई है, जो हो रहा है वह अद्भुत है। अंग्रेजीदां मीडिया छोटी-छोटी बात पकड़ बात का बवंडर बना रहा है।

देश में फिर एक बार ऐसी स्थिति बनाई जा रही है, मानो सांप्रदायिकता में समाज उबल रहा है, और कुछ सेक्युलर देवदूत उसको बचाने के लिए अपनी बलि चढ़ाने तक को तैयार हैं। क्या वाकई ऐसी स्थिति है? जिस तरह कुछ स्वनामधन्य महानुभावों ने अपना पुरस्कार लौटाना आरंभ किया है, उससे तो ऐसा ही लगता है। अलग-अलग हुई जघन्य अपराधों की घटनाओं को एक साथ जोड़कर ऐसी स्थिति बनाई जा रही है, मानो देश में जो सेक्युलर हैं, उनकी खैर नहीं। इस माहौल से परे जरा अपने आसपास नजर दौड़ाइए। क्या वाकई ऐसा ही है? जो उत्तर होगा वही सच्ची स्थिति का द्योतक होगा। सच यही है कि ऐसा वातावरण देश में नहीं है।

दादरी के बिसाहड़ा मामले की जघन्य घटना हमारे सामने है, और सारी प्रतिक्रियाएं उस पर आ रही हैं। पिछले 10 सितम्बर को बरेली के फरीदपुर थाने के दारोगा मनोज मिश्र को पशु तस्करों ने गोली मार दी। उनका दोष इतना भर था कि वह तस्करी के लिए यानी काटने के लिए ले जा रहे पशुओं से भरे ट्रक को पकड़ने के लिए घात लगाए हुए थे। जब ट्रक पकड़ में आ गए तो उनने गोली मारी और मनोज मिश्र की मृत्यु हो गई। क्या उनकी जान की कीमत नहीं थी? आज जो लोग छाती पीट रहे हैं, इनमें से किसी की आवाज उस घटना पर सुनाई दी? बिसाहड़ा में तो अखलाक के परिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पास बुलाया। उनसे बात की और 45 लाख रुपये का मुआवजा दिया। घटना की जांच चल रही है। हालांकि पुलिस दबाव के कारण कुछ ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर रही है, जो शायद दोषी नहीं हैं, जिनके विरुद्ध वहां प्रदर्शन भी हो रहा है। लेकिन दारोगा की मृत्यु पर तो मुख्यमंत्री का भी बयान नहीं आया। इन दो घटनाओं पर ऐसे दो प्रकार के व्यवहार को हम क्या कहेंगे?

बिसाहड़ा की घटना घोर निदंनीय है, उसके असली दोषियों को पकड़कर कानून में जो सख्त सजा हो वो मिलनी चाहिए। प्रदेश सरकार ने गृह मंत्रालय को जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें कहा है कि अभी तक इस घटना का कारण पता नहीं चला है। जांच चल रही है। जिस सरकार की पुलिस जांच कर रही है, उसको घटना का कारण ही पता नहीं और देश में घटना के दोषियों की पहचान करके कुछ झंडाबरदार सेकुलर जमात ने अपने स्तर पर फैसला भी कर लिया। कार्रवाई क्यों नहीं? कानून-व्यवस्था की जिम्मेवारी उप्र सरकार की है। अगर उप्र सरकार की जांच में किसी संगठन की साजिश नजर आती है, वह सामने लाए। फिर कार्रवाई करे। किसी ने उसका हाथ रोका नहीं है।

दादरी में अखलाक की हत्या भीड़ की मानसिकता से हुई है। एक व्यक्ति ज्यों ही भीड़ का हिस्सा हो जाता है, अपनी नैतिक मर्यादाएं भूल जाता है। भीड़ की मानसिकता से संचालित होता है। भीड़ उन्माद में बदल जाती है। ऐसा समूह अपने होश-हवाश खो देता है। ऐसी घटनाओं के बाद माहौल को सुधारने के लिए जरूरी है कि राजनैतिक नेतृत्व संयम रखे। कर्नाटक में कलबुर्गी की हत्या राज्य सरकार की विफलता है। उसकी जांच भी चल रही है। महाराष्ट्र में दो बहुचर्चित हत्याएं कांग्रेस के शासनकाल में हुई। वहां की पुलिस पता तक नहीं लगा सकी कि आखिर, कैसे हत्या हुई और कौन दोषी थे। उनमें पनसारे की हत्या के लिए वर्तमान महाराष्ट्र सरकार के तहत सनातन संस्था के एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है। अगर पक्षपात का मामला होता तो उसे आराम से रफा दफा किया जा सकता था।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की रिश्तेदार नयनतारा सहगल के बाद साहित्यकार अशोक वाजपेयी, मलयालम लेखिका सारा जोसफ और उर्दृ के मशहूर उपन्यासकार रहमान अब्बास ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया है। कांग्रेस सरकार के रहते स्वनामधन्य महानुभावों ने सरकारी पुरस्कार नहीं लौटाया।  आज सेक्युलरवादी तोप के गोले दागने वालों में से कितने लोगों ने ऐसा ही रवैया पहले अख्तियार किया था? आखिर, दादरी, महाराष्ट्र, कर्नाटक की घटना पर क्या होना चाहिए? उत्तर एकदम सरल है। राज्य सरकारें निष्पक्षता से जांच करें। जो दोषी हो, चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, उस पर कानूनी कार्रवाई करे। यह राज्य सरकारों का मामला है। केंद्र की भूमिका तब आएगी जब राज्य सरकारें अपना काम नहीं करेंगी।

अगर विरोध करना है, तो कर्नाटक सरकार का किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार का किया जाना चाहिए जहां ऐसी घटनाएं हुई हैं। लेकिन जो मुद्दा नहीं होना चाहिए उसे मुद्दा बनाकर और सेक्युलर कहलाने के लिए ये इस तरह प्रतीकात्मक विरोध करते हैं, या बयान देते हैं, जिनमें इनका अपना कुछ जाता नहीं। उल्टे इससे वातावरण विषाक्त होता है, समाज में तनाव बढ़ता है। लेकिन वो जो कुछ कर रहे हैं, उससे सांप्रदायिक शांति की जगह तनाव बढ़ेगा, दोनों के बीच दूरियां घटने की बजाय बढ़ेंगी, खाई पटने की जगह चौड़ी होगी।

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