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असहिष्णु नहीं है भारत

आप विरोध करिए – सर्मथन करिए, यह भारत में ही संभव है, पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं। यही भारत की विशेषता है, जो इसे दूसरों से अलग करती है। हम जिस संस्कृति के धारक हैं, उसमें सर्वधर्म समभाव है। वह प्राणिमात्र के कल्याण की प्रार्थना करती है। हमारे पूर्वजों ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद समाज को उदार, सहिष्णु और सबसे बढ़कर अनेकता में एकता का जो दर्शन व्यवहार में उतारा उसी का प्रतिफल है।

छद्म धर्मनिरपेक्ष बिरादरी इन दिनों खूब हल्ला मचा रही है। वह पिछले कई दिनों से दो मुद्दों पर भारत सरकार से लेकर पूरे हिंदू समाज को कोस रही है। साहित्यकार पुरस्कार लौटा रहे हैं। कोई राजनेता धर्मनिरपेक्षता की डफली बजा रहा है तो मीडिया का एक तबका ऐसा दिखा और पढ़ा रहा है जैसे भारत में आपसी सौहार्द का माहौल ही नहीं रहा। जिस तरह हमारे लेखक दावों और तर्कों का सहारा लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार पुरस्कार वापस किए जा रहे हैं, वह अपने ही विरोधाभासों से घिरी हुई राजनीतिक नजर आने लगी है। अगर ऐसा नहीं होता तो मुनव्वर राना तीन दिन में दो बार पलटी नहीं मारते। पहली बार वह पुरस्कार वापस करने वालों को नसीहत दे रहे थे तो तीन दिन बाद मीडिया के ऑफिस में ही झोले में चेक और सम्मान चिन्ह लेकर आ धमके। क्या बेहतर नहीं होता कि वह बिना इनको लिए ही वापसी की घोषणा कर देते। क्या चेक और प्रतीक चिन्ह लेकर आना सियासत का हिस्सा नहीं है। पुरस्कार वापस करने वालों में तमाम ऐसे नाम भी हैं, जिन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान खुले आम मोदी का विरोध किया था।

देश में बढ़ रही असहिष्णुता के खिलाफ पुरस्कार वापसी एक अभियान है। ऐसे में यह देखा जाना प्रासंगिक है कि समाज में असहिष्णुता का यह माहौल आया कहां से। हम जिस संस्कृति के धारक हैं, उसमें सर्वधर्म समभाव है। वह प्राणिमात्र के कल्याण की प्रार्थना करती है। कई सदियों तक आक्रांताओं ने हमें परेशान किया, हम पर राज किया। अंग्रेजों ने जुल्म और ज्यादती की, पर हम असहिष्णु नहीं हुए। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से आजादी का हथियार अहिंसा बनाया। फिर हम असहिष्णु क्यों हुए। कब हुए। यह विचारणीय है।

यह सच है कि आज जिस असहिष्णुता को लेकर हायतौबा मच रही है, वह भी एक नए किस्म की असहिष्णुता को जन्म दे रही है। यह हायतौबा कई ऐसे सवाल खडे़ कर रही है, जिसका माकूल उत्तर मिले बिना पुरस्कार वापसी का मंतव्य किसी राजनीतिक पार्टी के लिए काम करने जैसा दिखने लगता है। सवाल यह है कि आखिर अखलाक की मौत के लिए केंद्र की मोदी सरकार के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार जिम्मेदार क्यों नहीं हो सकती। एमएम कलबुर्गी की हत्या कर्नाटक में हुई, जहां कांग्रेस की सरकार है। नरेंद्र दाभोलकर की हत्या जब हुई थी, तब केंद्र में मनमोहन सरकार थी।

कर्नाटक में एम कलबुर्गी की हत्या हुई। उसकी सबने निंदा की। कलबुर्गी एक नामी इतिहासकार, साहित्यकार एवं चिंतक थे। हालांकि उनके लेखन से असहमत रहने वालों की बड़ी संख्या थी और है। वे एक विशेष विचारधारा पर सीधा हमला करते थे, हिंदू धर्म के अनेक प्रतीकों या कर्मकांडों का उपहास उड़ाते थे, लेकिन जब उनकी हत्या हुई तो पूरे देश ने उसकी एक स्वर में निंदा की। महाराष्ट्र के दो ऐसे ही सक्रियतावादियों की हत्याओं का विरोध पूरे देश ने किया। उसकी जांच चल रही है। तो यह है भारत। ऐसी घटनाओं पर जिस तरह का मुखर सक्रिय विरोध भारत में दिखता है वह हमारे पड़ोस के कई देशों में कहां दिखता है। आप भारत से उन देशों में फर्क देख लीजिए। भारत में कोई कड़वा सच या सफेद झूठ लिख दे तो भी उसे ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा जैसी हमारे पड़ोस के कई देशों में करना पड़ रहा है। 

गुलाम अली के मुंबई एवं पुणे के दो गायन कार्यक्रम शिवसेना के विरोध में रद्द हुए तो उसका सर्मथन करने वाले भी सामने आए। वह भी उस स्थिति में जब पाकिस्तान दिन रात आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा है। यानी ये गुलाम अली के कार्यक्रम रद्द होने का सर्मथन कर रहे हैं, लेकिन ऐसे लोग भी खड़े हो गए जिन्होंने कहा कि हम पाकिस्तान नहीं हो सकते। गुलाम अली साहब का कार्यक्रम हम करेंगे। दिल्ली में उनका कार्यक्रम तय हो गया। आप इसका विरोध करिए, सर्मथन करिए, पर यह भारत में ही संभव है, पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं। यही भारत देश की विशेषता है, जो इसे दूसरों से अलग करती है। तो विचार करने वाली बात है कि एक ही भूगोल, सभ्यता, संस्कृति का अंग रहे तीन देशों में इतना बड़ा अंतर क्यों है? इसका उत्तर हर भारतीय का सिर गर्व से उठा देगा। हमारे पूर्वजों ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद समाज को उदार, सहिष्णु और सबसे बढ़कर अनेकता में एकता का जो दर्शन व्यवहार में उतारा उसी का प्रतिफल है।

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