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आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी दूर करनी होगी!

भारतीय संविधान की आत्मा है बराबरी और इंसाफ़. आंबेडकर ने इस संविधान के बनने के बहुत पहले कहा था कि विधायिका जनता का प्रतिनिधित्व करती है, न कि मात्र बुद्धिजीवियों का. उनका आशय पढ़े-लखे लोगों को ही प्रतिनिधित्व का अधिकार देने से था. भारतीय संविधान जनता को संप्रभु मानता है और भारतीय राज्य अपनी संप्रभुता उसी जनता से ग्रहण करता है. यह ऐसा विलक्षण संविधान है जिसने एक ही बार हर वयस्क को मताधिकार दिया, उसमें किसी तरह की कोई शर्त नहीं लगाई. ऐसा करके उसने साधारण भारतीय जन की विवेक क्षमता पर भरोसा जताया.      

सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित किया है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र है और इसके संविधान की कई खासियतें भी हैं. इसी दिन भारतीय संविधान के शिल्पी बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर ने राष्ट्र को संविधान सुपुर्द किया था. इसीलिए इस खास दिन को संविधान-दिवस के रूप में मनाने का चलन साल दर साल बढ़ता जा रहा है. इस मौके पर लोग संविधान निर्माता के रूप में बाबा साहेब के कृतित्व को सराहने तथा संविधान की विशेषताएं बताने में एक दूसरे से होड़ लगाते हैं.

बहरहाल ‘संविधान सभा’ ने स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए ‘प्रारूप समिति ‘का गठन किया और बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर उसके अध्यक्ष बनाये गए. स्वतंत्र भारत के पहले विधिमंत्री के रूप में नेहरु मंत्रिमंडल में प्रवेश के बाद उनका ‘प्रारूप समिति’ का अध्यक्ष बनना दलित वर्ग के इतिहास में एक अविश्वास्य घटना थी. इस सिलसिले में काबिले गौर बात यह है कि पंडित नेहरु और सरदार पटेल  इस काम  के लिए अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संविधान विशेषज्ञ सर आइवोर जेनिंग्स को आमंत्रित करना चाहते थे, जिन्होंने कई एशियाई देशों के संविधान का प्रारूप तैयार किया था.किन्तु गांधीजी ने सुझाव दिया कि डॉ.आंबेडकर के रूप में भारत में ही एक असाधारण कानून व संविधान विशेषज्ञ मौजूद है, अतः किसी विदेशी के विषय में विचार न किया जाय. अंततः गांधीजी का सुझाव मान्य हुआ और संविधान के प्रारूप को तैयार करने की जिम्मेवारी डॉ.साहेब के कन्धों पर आन पड़ी.
डॉ.आंबेडकर का संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष बनना सचमुच एक ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि सदियों से जो थे सम्पूर्ण अधिकार-शून्य,जिनका जीवन-पात्र लबालब भरा था सहस्रों वर्षों के अपमान से,उन्हीं में से एक अछूत को मिला था यह निर्धारण करने का अवसर कि ‘किसका क्या होगा अधिकार और देश चलेगा किस पद्धति से.’ डॉ.आंबेडकर भी अवगत थे अपनी असाधारण भूमिका से कि,‘किसी भी देश में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तो एक के बाद एक आते रहेंगे किन्तु किसी राष्ट्र के जीवन में संविधान-प्रणेता का आसन अलंकृत करते का दुर्लभ अवसर किसी एक ही व्यक्ति को मिलता है.’

भारतीय संविधान की आत्मा है बराबरी और इंसाफ़. आंबेडकर ने इस संविधान के बनने के बहुत पहले कहा था कि विधायिका जनता का प्रतिनिधित्व करती है, न कि मात्र बुद्धिजीवियों का. उनका आशय पढ़े-लखे लोगों को ही प्रतिनिधित्व का अधिकार देने से था. भारतीय संविधान जनता को संप्रभु मानता है और भारतीय राज्य अपनी संप्रभुता उसी जनता से ग्रहण करता है. यह ऐसा विलक्षण संविधान है जिसने एक ही बार हर वयस्क को मताधिकार दिया, उसमें किसी तरह की कोई शर्त नहीं लगाई. ऐसा करके उसने साधारण भारतीय जन की विवेक क्षमता पर भरोसा जताया. क्या जनतंत्र जैसे आधुनिक विचार का अभ्यास अनपढ़ जनता कर पाएगी? साल-दर-साल उस जनता ने इस विश्वास को सही साबित किया है.

इस तरह एक तरफ़ जहां संविधान जनता के लिए एक कसौटी है तो दूसरी ओर जनता संविधान की कसौटी है. एक ख़ास दर्जे तक पढ़े होने पर ही जन प्रतिनिधि बनने की योग्यता होगी, इस तरह का क़ानून लाने का प्रयास सरकारें कर रही हैं. यह भारतीय संविधान की मूल आत्मा के ख़िलाफ़ है. ये सरकारें जनता के एक बड़े हिस्से को जनता का प्रतिनिधित्व करने के अयोग्य ठहरा रही हैं. बहरहाल देश की वर्तमान अवस्था को देखते हुए आज के विशेष दिन डॉ.आंबेडकर की उस चेतावनी को फिर से याद करना जरुरी लगता है जो उन्होंने 25 नवम्बर 1949 को संविधान पर चर्चा के दौरान सुनाई थी. उन्होंने उस दिन राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र में रूपांतरित करने का सुझाव देते हुए कहा था कि भारत में दो बातों का अभाव है-‘ये हैं-सामाजिक समता और आर्थिक समता’.इसके बाद उन्होंने राष्ट्र को सावधान करते हुए कहा था-’26जनवरी, 1950 को हम राजनीतिक रूप से समान और आर्थिक और सामाजिक रूप से असमान होंगे.जितना शीघ्र हो सके हमें यह भेदभाव और पृथकता दूर कर लेनी होगी.

यदि ऐसा नहीं किया गया तो जो लोग इस भेदभाव के शिकार हैं, वे राजनीतिक लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा देंगे,जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है.’ हमें यह स्वीकारने में कोई द्विधा नहीं होनी चाहिए कि स्वाधीन भारत के शासकों ने डॉ.आंबेडकर की उस ऐतिहासिक चेतावनी की प्रायः पूरी तरह अनेदखी कर दी,जिसके फलस्वरूप आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी,जोकि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है,का भीषणतम साम्राज्य आज भारत में कायम है.उनकी चेतावनी की अनदेखी के फलस्वरूप आज भी परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न तबके का शक्ति के स्रोतों (आर्थिक,राजनीतिक,धार्मिक-सांस्कृतिक) पर वर्चस्व अटूट है.ऐसी गैर-बराबरी विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है. सामाजिक-आर्थिक न्याय के सरकारों के तमाम दावों के बावजूद भारत में आर्थिक गैर-बराबरी तेजी से बढ़ रही है.

इस विषय में हाल ही में क्रेडिट सुइसे नामक एजेंसी ने वैश्विक धन बंटवारे पर जो अपनी छठवीं रिपोर्ट प्रस्तुत की है वह काबिले गौर है.रिपोर्ट बताती है कि सामाजिक-आर्थिक न्याय के सरकारों के तमाम दावों के बावजूद भारत में आर्थिक गैर-बराबरी तेजी से बढ़ रही है.रिपोर्ट के मुताबिक 2000-15 के बीच जो कुल राष्ट्रीय धन पैदा हुआ उसका 81 प्रतिशत टॉप की दस प्रतिशत आबादी के पास गया.जाहिर है शेष निचली 90 प्रतिशत जनता के हिस्से में 19 प्रतिशत धन आया.19 प्रतिशत धन की मालिक 90 प्रतिशत आबादी में भी नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के पास 4.1 प्रतिशत धन ही आया.-‘गैर-बराबरी अक्सर समाज में उथल-पुथल की वजह बनती है.सरकारी और सियासी पार्टियों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए. संसाधनों और धन का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण कैसे हो,यह सवाल अब प्राथमिक महत्व का हो गया है.’

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