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सबके लिए सबका संघ

सबके लिए सबका संघ
जो संगठन आरएसएस को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने तो कभी यह बताने की जहमत मोल नहीं ली कि देश के विकास को लेकर, संसाधनों के बंटवारे को लेकर, अवसरों की समानता को लेकर उनकी अपनी क्या दृष्टि है। बेहतर होगा कि संघ की इस पहल से प्रेरणा लेकर अन्य संगठन भी अपनी बुनियादी दृष्टि के बारे में आम देश वासियों की समझ साफ करें ताकि उनके समर्थकों और विरोधियों को ऐसी कसौटियां उपलब्ध हों, जिन पर उनके कामकाज को परखा जा सके।
Image result for 'भारत का भविष्य: संघ का दृष्टिकोण'दिल्ली में ‘भारत का भविष्य: संघ का दृष्टिकोण’ को लेकर आयोजित व्याख्यानमाला में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बहुत साफ शब्दों में संघ की साेच का खुलासा किया है। उनकी सीधी आैर दाे टूक बातों का अर्थ बहुत गहरा आैर प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है। संघ नेतृत्व ने देश-विदेश से आमंत्रित अतिथियों के सामने यह स्पष्ट किया, कि भारत के भविष्य से जुड़े विविध पहलुओं पर उसकी सोच क्या है। देश के सबसे पुराने और व्यापक संगठनों में से एक संघ ने अपनी तरफ से पहल कर विभिन्न सवालों पर खुलकर अपनी राय दी है।
संघ की समूची सोच के केंद्र में हिन्दुत्व का मुद्दा जुड़ा रहा है। अक्सर इस मुद्दे को लेकर गलतफहमियां भी पनपती रही है और कभी-कभी हिन्दुत्व व भारतीयता एक-दूसरे के आमने-सामने भी खड़े होने की स्थिति में आते रहे हैं। संघ के विचारक इसमें भेद स्वीकार नहीं करते और मानते हैं कि भारत का उद्गम ही हिन्दुत्व के सूत्र से बंधा हुआ है। संघ ने भारत को सशक्त बनाने के लिये अपनी मौलिक विचारधारा के बावजूद विरोधी विचारधाराओं को भी साथ लेकर चलने का प्रयास किया है।
 
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ का हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प किसी मत का विरोध करना नहीं है। वह मानता है कि भेदरहित, स्वार्थमुक्त समाज ही स्वतंत्रता और स्वतंत्र राष्ट्र के परमवैभव की गारंटी है। भागवत ने कहा कि भारतीय समाज विविधताओं से भरा है, किसी भी बात में एक जैसी समानता नहीं है, इसलिए विविधताओं से डरने के बजाए उन्हें स्वीकार करना और उनका उत्सव मनाना चाहिए।
संघ सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने राष्ट्रीयता, भारतीयता के साथ समाज एवं राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता पर जिस तरह अपने विचार व्यक्त किए उससे यह स्पष्ट है कि इस संगठन की दिलचस्पी राजनीति में कम और राष्ट्रनीति में अधिक है। उन्होंने समाज निर्माण को अपना एक मात्र लक्ष्य बताया। इस क्रम में उन्होंने हिंदू और हिंदुत्व पर जोर देने के कारणों का भी उल्लेख किया। इससे संघ और हिंदुत्व को लेकर व्याप्त तमाम भ्रांतियां दूर हुई होंगी।
जो संगठन आरएसएस को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्होंने तो कभी यह बताने की जहमत मोल नहीं ली कि देश के विकास को लेकर, संसाधनों के बंटवारे को लेकर, अवसरों की समानता को लेकर उनकी अपनी क्या दृष्टि है। बेहतर होगा कि संघ की इस पहल से प्रेरणा लेकर अन्य संगठन भी अपनी बुनियादी दृष्टि के बारे में आम देश वासियों की समझ साफ करें ताकि उनके समर्थकों और विरोधियों को ऐसी कसौटियां उपलब्ध हों, जिन पर उनके कामकाज को परखा जा सके। संघ के आलोचक निरंतर उसे संविधान विरोधी, दलित-अल्पसंख्यक विरोधी, आरक्षण विराेधी हाेने का दुषप्रचार करते रहते है।
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ के प्रति फैले इस भ्रम को दूर करने का काम किया है। सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए संविधान सम्मत आरक्षण को संघ का पूरा समर्थन है। जहां तक सवाल है कि आरक्षण कब तक चलेगा तो संघ की साेच है कि इसे वहीं तय करेंगे जिन्हें आरक्षण मिला है। संघ का मत है कि तब तक इसको जारी रहना चाहिए। जबतक समाज के सभी अंग बराबरी में नहीं आ जाते। संघ  मानता है कि हजार वर्ष से यह स्थिति है कि हमने समाज के एक अंग को विफल बना दिया है। जरूरी है कि जो ऊपर हैं वह नीचे झुकें और जो नीचे हैं वे एड़ियां उठाकर ऊपर हाथ से हाथ मिलाएं। इस तरह जो गड्ढे में गिरे हैं उन्हें ऊपर लाएंगे। समाज को आरक्षण पर इस मानसिकता से विचार करना चाहिए। सामाजिक कारणों से एक वर्ग को हमने निर्बल बना दिया। स्वस्थ समाज के लिए एक हजार साल तक झुकना कोई महंगा सौदा नहीं है। समाज की स्वस्थता का प्रश्न है, सबको साथ चलना चाहिए।
दलित समाज के उत्पीड़न पर संघ की साेच है कि सामाजिक पिछड़ेपन व जातिगत अहंकार के कारण अत्याचार की परिस्थिति बनी। उससे निपटने के लिए यह अत्याचार निरोधक कानून बना। संघ का मत है कि यह ठीक से लागू होना चाहिए और इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। लेकिन यह केवल कानून से नहीं होगा। समाज में सद्भाव व समरसता के भाव से होगा। अत्याचार, अत्याचार है। चाहे वह किसी का भी हो। इसे खत्म करने के लिए सद्भावना जगाने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में कई संघ विरोधी ताकते दलित समाज के बीच संघ काे संविधान विरोधी बताने आैर आरक्षण विराेधी हाेने का दुषप्रचार कर रही है। उनका एक ही मकसद है कि दलित समाज काे अति वृहत हिंदू समाज से अलग किया जा सके। संघ के साफ दृष्टिकोण के बाद दलित समाज को खुद अपने विरोधियों और हितैषियों की पहचान करनी होगी।
अल्पसंख्यकों के बारे में डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हम सभी एक देश की ही संतान हैं, भाई-भाई रहें। सब अपने हैं। हमारा आह्वान राष्ट्रीयता का है। मातृ भक्ति का है। यही हिंदुत्व है। संस्कृति, भूमि व पूर्वज हम सबके एक हैं। जहां तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ की बात है तो गुरुजी के सामने जैसी परिस्थिति थी, वैसा विचार हुआ, लेकिन संघ बंद संगठन नहीं है। ऐसा नहीं है कि जो उन्होंने बोल दिया, वहीं लेकर चले। हम अपनी सोच में भी परिवर्तन करते हैं।
अज्ञानता, अशिक्षा और पूर्वाग्रह से संघ को कितनी भी गालियां दी जा सकती हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तक, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी  बौद्धिक और बेहद परिपक्व थे। यदि उन्होंने संघ का सम्मान किया, संविधान के रचयिता डा. भीमराव रामजी अंबेडकर और ‘संपूर्ण क्रांति’ के उद्घोषक जयप्रकाश नारायण ने भी संघ की सकारात्मक भूमिकाओं का वर्णन किया था। महात्मा गांधी ने संघ को सबसे अनुशासित, संगठित और छुआछूत की समाप्ति वाला संगठन कहा था। क्या ये मान्यताएं और टिप्पणियां महत्त्वहीन हैं?
संघ की साेच शोषण और भेदभाव रहित समतामूतक व समानता पर आधारित समाज बनाने की है। संघ का लक्ष्य भारत को एकजुट व अखंड रखना है। उम्मीद है कि तीन दिनों के अधिवेशन में संघ यह संदेश देने में सफल रहा है कि “सबके लिए सबका संघ” निश्चय ही इस आयोजन के बाद संघ के आलोचकों के भ्रम दूर होंगे।
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