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चर्च में बदलाव के लिए आगे आए – ईसाई समाज

सबसे बुरी स्थिति उन पादरियों आैर ननों की है जाे चर्च व्यवस्था में रहते हुए अपनी आवाज उठा रहे है। आज जब पूरी दुनिया में चर्च के अनुयायी उसके एकाधिकार काे चुनाैती दे रहे है। यूराेप के चर्च में ताजी हवा के झाेंके आने की उम्मीद बन रही है। वहीं भारत में कोई सुगबुगाहट नहीं है।
Screenshot_2019-01-11 Photo - Google+  B ईसाई संगठन पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट ने ईसाई समाज से आह्वान किया है कि वह चर्च में बदलाव की आवाज उठाने वालाे के साथ खड़ा हाे। मूवमेंट के सहयोगी रहे फादर विलियम प्रेमदास चौधरी की तृतीय पुण्यतिथि पर बाेलते हुए वरिष्ट स्तंभकार और मूवमेंट के अध्यक्ष आर.एल. फ्रांसिस ने इस बात पर अफसोस जताया कि चर्च संसाधनों पर काबिज मुठ्ठीभर लोग गरीबों की आवाज उठाने वाले पादरियाें, ननाें आैर लेमैन का उत्पीड़न कर रहे है। उनकी आवाज काे दबाया जा रहा है।
फ्रांसिस ने कहा कि सबसे बुरी स्थिति उन पादरियों आैर ननों की है जाे चर्च व्यवस्था में रहते हुए अपनी आवाज उठा रहे है। चर्च के कई अनैतिक कार्य लगातार उजागर हाे रहे है। केरल के कोट्टायम में चर्च में जाने वाली एक महिला ने पांच पादरियों पर यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है।
केरल में एक नन ने चर्च के बिशप के खिलाफ बलात्कार करने का मामला दर्ज कराया है। नन का कहना है कि बिशप ने कई बार उसका यौन शोषण किया। आरोपी बिशप  फ्रेंको मुलक्कल कैथोलिक डायोसीस (जालंधर-पंजाब) का मुखिया है, जिन्हें कुछ साल पहले ही वेटिकन ने पंजाब के कैथोलिक चर्च की जिम्मेदारी सौंपी है। उसे बड़ी मुश्किल से पदमुक्त किया गया लेकिन उसके प्रभाव में अभी भी काेई कमी नहीं आई है।
 
रांची के मिशनरीज ऑफ चैरिटी से संचालित ‘निर्मल हृदय’ से बच्चों की बिक्री का मामला शर्मनाक है। कैथाेलिक चर्च की मदद से मदर टेरेसा ने जिन संस्थाओं को मानवता की सेवा के लिए खड़ा किया था उनमें बच्चों की खरीद-फरोख्त हाेना यह तो ईसा-भक्ति नहीं, ईश-द्रोह है। बच्चों की बिक्री का मामला अब देशव्यापी मानव तस्करी का पर्दाफाश कर रहा है। अफसाेस की बात यह है  कि कि ईसाई समाज में इस पर कोई चर्चा नही है।
रांची के मिशनरीज ऑफ चैरिटी आैर बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रेंको मुलक्कल से जवाब मांगने की उपेक्षा हम ईसाई चर्च नेताओं काे बचाने आैर उनके तथाकथित काले कारनामाें पर पर्दा डालने और घटनाओं काे नज़रअंदाज़ करने में लगे हुए हैं। फ्रांसिस ने कहा कि आज ईसाई युवाआें में सामाजिक एवं राजनीतिक मामलाें काे लेकर काेई जागरूकता नहीं है। चर्च लीडर युवाओं के बीच सामाजिक एवं राजनीतिक दर्शन काे नहीं रख पा रहे है। केवल चर्च दर्शन से अवगत करा रहे है।
चर्च व्यवस्था में रहते हुए बदलाव की बात करने वाले पादरियाें, ननाें आैर लेमैन काे इन्साफ देना तो दूर की बात, उन्हें जलील किया जा रहा है। क्या यह शर्म की बात नहीं  है, कि एक अबला नन जाे इन्साफ मांग रही थी। उसे इन्साफ देना तो दूर की बात, उसे जलील किया गया। चर्च नेतृत्व ने जिस तरह पीड़ित नन का चरित्र हनन किया उसकी इजाजत काेई सभ्य समाज नहीं देता।
आर.एल. फ्रांसिस ने कहा कि फादर विलियम प्रेमदास चौधरी के संघर्ष को हमें भूलना नहीं चाहिए कि कितनी कठिन परिस्थितियों में उन्होंने चर्च व्यवस्था में रहते हुए आम ईसाइयों के अधिकारों की बात की, जिसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। उनकी  “अनवांटेड प्रीस्ट” एक दलित पादरी की आत्मकथा (An Unwanted Priest , The Autobiography of a Dalit Priest) पढ़कर हम उनके कामाें काे जान सकते हैं।
भारत के चर्चों में पादरियों और बिशपों ने ननों का अथाह यौन शोषण किया है? समाचार एजेंसी एपी की एक छानबीन से ऐसी घटनाएं बड़े पैमाने पर होने के संकेत मिले हैं। इस अध्ययन के मुताबिक वेटिकन को लंबे समय से पता है कि एशिया, यूरोप, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में पादरी और बिशप ननों का यौन शोषण करते हैं। इसे रोकने के लिए वेटिकन ने बहुत ही कम कोशिशें की हैं। एसोसिएटेड प्रेस (एपी) ने 2018 में यह रिपोर्ट लिखी थी। अब एपी ने भारत को चुनते हुए यहां ऐसे मामलों की पड़ताल की है। इस दौरान पता चला है कि भारत में दशकों से चर्च परिसर के भीतर ननों का यौन शोषण हो रहा है।

ननों, पूर्व ननों और पादरियों समेत कई लोगों ने कहा कि ऐसे मामलों की उन्हें सीधी जानकारी है। इसके बावजूद भारत की ननों की समस्या धुंधली पड़ी रहती है। इसकी वजह हमारी चुप रहने की संस्कृति भी हो सकती है। आज जब पूरी दुनिया में चर्च के अनुयायी उसके एकाधिकार काे चुनाैती दे रहे है। यूराेप के चर्च में ताजी हवा के झाेंके आने की उम्मीद बन रही है। वहीं भारत में कोई सुगबुगाहट नहीं है।

आम ईसाइयों को चाहिए कि वह उन लाेगाें का साथ दें, जाे चर्च ढांचे में शोषित -उत्पीड़ित किए जा रहे हैं। भारतीय ईसाइयों के लिए यह दुखद है कि सैकड़ों सालों से देश के अंदर चर्च में काेई सुधारवादी आंदोलन खड़ा नहीं हो सका।
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