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सपा-बसपा दल मिले या दिल भी ?

राजनीति का दुर्भाग्य देखिए कि जिन ब्राह्मणों को गाली देकर मायावती सत्ता की राजनीति कर रही थीं, उस दिन जब उनकी जान आफत में फंसी तो दो ब्राह्मणों ने दौड़कर उनकी इज्जत आबरू की रक्षा की और जान भी बचाई। इसमें एक थे कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी और दूसरे भाजपा के ब्रह्मदत्त द्विवेदी। फोन पर तिवारी अधिकारियों को सूचित कर रहे थे तो गेस्ट हाउस में भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी (जिनकी बाद में हत्या कर दी गयी) मायावती को बचाने के लिए सपाई गुण्डों से लोहा ले रहे थे।

imagesआजकल मॉब लिंचिंग पर बहस करना और इसका विरोध करना एक फैशन बन गया है। लेकिन उस समय तक किसी कम्युनिस्ट ने राजनीति के लिए इस शब्द का आविष्कार नहीं किया था। लेकिन शनिवार को अपनी प्रेस कांफ्रेस में मायावती ने जिस गेस्ट हाउस कांड का जिक्र किया वह स्वतंत्र भारत की राजनीति में शायद पहली मॉब लिंचिंग थी जिसे समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के उत्तेजित हुजूम ने अंजाम दिया था।

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने चंद्रशेखर से अलग होकर यादव राजनीति की बुनियाद डाली थी। इस यादवी राजनीति के सत्ता सुख के लिए जरूरी था कि वो बसपा को अपने साथ ले।  1993 में बसपा के समर्थन से मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री भी बने लेकिन 1995  में कांशीराम ने सपा से समर्थन वापस ले लिया।

इस फैसले के बाद मायावती ने गेस्ट हाउस में अपने विधायकों की बैठक बुलाई थी। सपा के लोगों को किसी तरह इस बात की जानकारी मिल गई। यादव बिरादरी को सत्ता का नशा ऐसा चढ़ा था कि किसी भी कीमत पर उस खुमारी को उतारना नहीं चाहते थे। इसलिए यादव बिरादरी के पगलाए समर्थक लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस पहुंचे। गेस्ट हाउस के भीतर के कमरे में जहां बैठक चल रही थी, वहां मौजूद बसपा के लोगों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। उस दिन मायावती यादवी मॉब लिंचिंग का शिकार हो ही जाती अगर दो नेता नहीं होते।

राजनीति का दुर्भाग्य देखिए कि जिन ब्राह्मणों को गाली देकर मायावती सत्ता की राजनीति कर रही थीं, उस दिन जब उनकी जान आफत में फंसी तो दो ब्राह्मणों ने दौड़कर उनकी इज्जत आबरू की रक्षा की और जान भी बचाई। इसमें एक थे कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी और दूसरे भाजपा के ब्रह्मदत्त द्विवेदी। उस वक्त नारायणदत्त तिवारी के साथ मौजूद रहे विश्वनाथ चतुर्वेदी बताते हैं कि कैसे बौखलाते हुए तिवारी ने अधिकारियों को फोन लगाया और कहा कि एक महिला की इज्जत का सवाल है, जितना जल्दी हो, वहां जाओ। फोन पर तिवारी अधिकारियों को सूचित कर रहे थे तो गेस्ट हाउस में भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी (जिनकी बाद में हत्या कर दी गयी) मायावती को बचाने के लिए सपाई गुण्डों से लोहा ले रहे थे।

खैर, समय पर हुई कार्रवाई और बचाव के कारण मायावती की जान तो बच गयी लेकिन उनके मन पर इतनी गहरी चोट लगी कि फिर उन्होंने समाजवादी पार्टी को न समर्थन दिया और न लिया। मायावती को सपा से इतनी नफ़रत इसलिए हो गई क्योंकि उनका मानना है कि गेस्ट हाउस में उस रोज़ जो कुछ हुआ, वो उनकी जान लेने की साज़िश थी। लेकिन राजनीति तो नफे नुकसान पर चलती है।

इस समय मायावती को अब सपा के साथ जाने में राजनीतिक फायदा दिख रहा है इसलिए समझौता करने को तैयार हो गयीं। लेकिन उनके मन में उस घटना का असर कितना गहरा है कि समझौते का ऐलान करते समय भी दो बार उस घटना का जिक्र किया जिसका मतलब है कि दिल पर कितना बड़ा पत्थर रखकर उन्होंने सपा से हाथ मिलाया है।

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