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आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र की गैर-बराबरी एक चुनौती

भारत की मुख्य चुनौती अब भी आर्थिक और समाजिक क्षेत्र की गैर-बराबरी है. इसके कारण समाज के विभिन्न तबकों में आक्रोश है. भारत ने 1991 के बाद जिन आर्थिक नीतियों को अपनाया है, उससे गंभीर हालात पैदा हो गए हैं. इस कारण सामाजिक गैर-बराबरी भी गंभीर हो गयी है. इसका असर समाज और देश के विभिन्न क्षेत्रों में दिख रहा है. पिछले दशक भर से भारत के वंचित जनसमुदायों का असंतोष बहुत गहरा गया है. भारत की राजनीति जिस तरह कॉरपोरेट घरानों के आगे नतमस्तक है, उसका असर आमजन के सशक्तिकरण पर भी पड़ रहा है.

भारत नेflag-code-of-india-1470988799_835x547 स्वतंत्रता संग्राम  के दौरान जिन सपनों और मूल्यों से दुनिया में परतंत्र देशों में हलचल पैदा की थी, उसे गणतंत्र की प्रतिबद्धता ने व्यापक स्वर दिया है . भारत दुनिया के चंद देशों में एक है जिसने आजादी के बाद  लोकतंत्र को व्यापक और मजबूत बनाने में कामयाबी हासिल की है. भारत का संविधान वह जीवंत दस्तावेज है, जो भारत की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है और एक वैज्ञानिक चेतना के साथ समाज में गैर-बराबरी समाप्त करने की प्रतिबद्धता जाहिर करता है.

भारत की आजादी के आगे-पीछे स्वतंत्र हुए ज्यादातर देश जब सैन्य और नागरिक तानाशाहियों के शिकार हाे रहे थे, भारत के नेतृत्व ने लोकतंत्र को कमजोर नहीं होने दिया. आजादी के बाद से ही भारत के जनगण ने लोकतंत्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाते हुए उन तमाम प्रयासों को नकार दिया जो स्वतंत्रता को सीमित करने के मकसद से अमल में लाने की पहल की गयी. भारत का संविधान ही शक्ति का वह स्रोत है, जो लोकतंत्र की चेतना को व्यापक बनाने का आधारतत्व प्रदान करता है. जीवंत संविधान जहां लोकतंत्र की गारंटी देता है, वहीं समाज के सभी तबकों को अपनी आकांक्षाओं के अनुकूल जीवन जीने की ताकत भी प्रदान करता है.

बावजूद हमें  पर इस तथ्य को याद रखना चाहिए कि डा. अंबेडकर ने कहा था कि संविधान राजनीतिक बराबरी तो देता है. एक व्यक्ति एक वोट महत्वपूर्ण है. उन्होंने इसके बाद चेतावनी दी थी कि यदि आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी को दूर नहीं किया जाएगा तो देश को भारी कीमत चुकानी होगी. इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दुनिया भर में पिछले कुछ समय में असमानता बहुत गंभीर हो गयी है. भारत इसका अपवाद नहीं है.

भारत की मुख्य चुनौती अब भी आर्थिक और समाजिक क्षेत्र की गैर-बराबरी है. इसके कारण समाज के विभिन्न तबकों में आक्रोश है. भारत ने 1991 के बाद जिन आर्थिक नीतियों को अपनाया है, उससे गंभीर हालात पैदा हो गए हैं. इस कारण सामाजिक गैर-बराबरी भी गंभीर हो गयी है. इसका असर समाज और देश के विभिन्न क्षेत्रों में दिख रहा है. पिछले दशक भर से भारत के वंचित जनसमुदायों का असंतोष बहुत गहरा गया है. भारत की राजनीति जिस तरह कॉरपोरेट घरानों के आगे नतमस्तक है, उसका असर आमजन के सशक्तिकरण पर भी पड़ रहा है.

मशहूर अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने दुनियाभर की गैर-बराबरी का अध्ययन कर बताया है कि भारत सहित दुनिया भीषण असमानता का शिकार होती जा रही है. पिकेटी ने भारत की असमानता को भी गंभीर और चिंताजनक बताया है. अभी हाल ही में ऑक्सफेम ने रिपोर्ट जारी कर इस असमानता को रेखांकित किया है. दुनिया भर में इस असमानता ने आमजनों में असंतोष पैदा किया है.

भारत का संविधान एक अनमोल धरोहर है, जो अपनी वैचारिकता के साथ लोकतंत्र की चेतना को विस्तारित करता है. गणतंत्र दिवस वह अवसर है, जो हमें संविधान की प्रस्तावना के अनुकूल आचरण करने की प्रतिबद्धता का संकल्प प्रदान करता है. साथ ही तमाम तरह की गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए राजनीति को सतर्क करता है.

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