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राजनीति में विरोध करने की भी एक मर्यादा होती है

सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर राजीव कुमार, पश्चिम बंगाल के गृहसचिव व डीजीपी को अवमानना का नोटिस दिया है, जिसका जवाब इन्हें 19 फरवरी को देना है। इस नोटिस का साफ आशय है कि उच्चतम न्यायालय इन तीनों पदों पर आसीन अफसरों को अपनी ड्यूटी निभाने में अदालत की अवमानना के जिम्मेदार मानता है। ये तीनों पद बंगाल सरकार के अहम पद हैं, ऐसे में यह ममता बनर्जी की बड़ी नैतिक हार कही जा सकती है।
imageपश्चिम बंगाल में वह सब कुछ हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए था। सरकारी संस्थाएं आपस में टकरा रही हैं। एक चुनी हुईं मुख्यमंत्री एक पुलिस अफसर के समर्थन में धरना पर बैठती हैं, साथ में पुलिस अधिकारी भी धरना पर बैठते हैं और सरकारी एजेंसी के कंधे पर मुद्दों को रखकर केंद्र के साथ टकराव की राजनीति की जाती है। कोलकाता पुलिस कमिश्नर और सीबीआई के बीच मसले को तिल का ताड़ बनने से रोका जा सकता था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।
ममता बनर्जी ने अपने मुख्यमंत्री पद की गरिमा का जरा भी ध्यान नहीं रखा। करीब नौ करोड़ की आबादी वाले राज्य पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का एक अपने सरकारी पुलिस अफसर को बचाने के लिए ढाल बनना राजनीति के गिरते स्तर की तरफ इशारा करता है। कायदे से सरकार और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए, पर ममता सरकारी कामकाज को हथियार बनाकर राजनीति करती दिख रही हैं। कोलकाता पुलिस कमिश्नर और सीबीआई दोनों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए था कि सरकारी एजेंसियों की गरिमा बरकरार रहे और इन्हें किसी का राजनीतिक हथियार नहीं बनने दिया जाता।
वर्षों पहले हुए शारदा चिटफंड घोटाले की छानबीन हेतु देश के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने गई सीबीआई के अधिकारियों और कर्मचारियों को पश्चिम बंगाल की पुलिस ने कार्रवाई करने से रोका भी और अधिकारियों को कुछ घंटे पुलिस थाने में बिठाने के बाद छोड़ भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को आईना दिखाया है, पर कोलकाता पुलिस कमिश्नर को सीधे कटघरे में खड़ा किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार शिलांग में सीबीआई के सामने पेश हों, सारदा व रोजवैली चिटफंड घोटाले की जांच कर रही सीबीआई की पूछताछ में सहयोग करें। हालांकि कमिश्नर की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।
सर्वोच्च न्यायालय ने कमिश्नर राजीव कुमार, पश्चिम बंगाल के गृहसचिव व डीजीपी को अवमानना का नोटिस दिया है, जिसका जवाब इन्हें 19 फरवरी को देना है। इस नोटिस का साफ आशय है कि उच्चतम न्यायालय इन तीनों पदों पर आसीन अफसरों को अपनी ड्यूटी निभाने में अदालत की अवमानना के जिम्मेदार मानता है। ये तीनों पद बंगाल सरकार के अहम पद हैं, ऐसे में यह ममता बनर्जी की बड़ी नैतिक हार कही जा सकती है। ममता बेशक सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संविधान व लोकतंत्र की जीत बताएं और कहें कि देश में कोई बिग बॉस नहीं है, लेकिन नाटकीय अंदाज में एक मुख्यमंत्री का धरने बैठ जाना और केंद्र सरकार पर अनर्गल आरोप लगाते हुए राजनीतिक स्यापा करना क्या संविधान की पालना है? जिसकी उन्होंने शपथ ली है।
हाल के दिनों में ममता सरकार ने जिस तरह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रथयात्रा रोकी, उनके हेलीकॉप्टर को उतरने की इजाजत नहीं दी, राजनाथ सिंह, स्मृति ईरानी, शहनवाज हुसैन, योगी आदित्यनाथ आदि को बंगाल में सभा करने की अनुमति नहीं दी, इससे तो यही लगता है कि पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक सरकार नहीं है, बल्कि निरंकुश शासन है। क्या ममता सरकार भूल गई है कि उनके शासित राज्य में 40 हजार करोड़ रुपये का सारदा व रोजवैली चिटफंड घोटाला हुआ, जिसमें करीब 20 लाख लोगों के पैसे डूब गए, सैकड़ों लोगों की जान गई, कई आरोपित जेल में हैं, उनके मंत्री भी आरोपित हैं, तो इस घोटाले की पूरी जांच होनी चाहिए और सभी दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।
 मुख्यमंत्री के नाते ममता बनर्जी का पहला दायित्व होना चाहिए था कि वे इसकी ईमानदारी से जांच करवातीं और गुनहगारों को सजा दिलवातीं। लेकिन हो उल्टा रहा है, पहले उनकी सरकार की एसआईटी ने जांच के नाम पर लीपापोती की और अब जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई जांच कर रही है तो, खुद ममता राह में रोड़े बन रही हैं। यह कैसी नैतिकता है? ऐसे में ममता बनर्जी की ईमानदारी पर तो सवाल उठेंगे ही। अगर दीदी सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करती हैं, जैसा उन्होंने कहा है, तो उन्हें केंद्र से टकराने की बजाय सारदा घोटाले की जांच में सहयोग करना चाहिए। हालांकि इस जांच को अंजाम तक पहुंचाने में शीर्ष अदालत ही उम्मीद बची है।
कानून से ऊपर तो कोई भी नहीं है। देश एक संविधान के नीचे चल रहा है और ममता धरना देकर अपने को संविधान व कानून से ऊपर होने की कोशिश कर रही हैं जोकि गलत है। राजनीति में विरोध करने की भी एक मर्यादा होती है, उस मर्यादा में रहकर ही एक-दूसरे का विरोध करना चाहिए। मुख्यमंत्री का धरने पर बैठकर केंद्र सरकार विरुद्ध बोलना देश की व्यवस्था को चुनौती देना ही है। ममता ने जिस तरह की रणनीति को अपनाया है वह ममता व उनके समर्थकों को अंधेरी गली की ओर ले जा रही हैं।
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