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सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद आदिवासियों में सरकार के खिलाफ आक्रोश

सर्वोच्च न्यायालय ने जंगलों में रहने वाले ऐसे आदिवासियों और वनवासियों को निकालने के लिए कहा है, जिनका वनभूमि पर दावा नहीं बनता। जाहिर है, इस आदेश के बाद झारखंड और बिहार समेत तमाम राज्यों के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों और वनवासियों के समक्ष बड़ा संकट खड़ा हो गया है। जंगल को ही अपना सब कुछ मानने वाले ये आदिवासी वहां से बेदखल होने के बाद कहां जाएंगे?  मोदी सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलने के लिए अध्यादेश लाये ।
 
अगर हम सिर्फ झारखंड को लें, तो यहां के पुराने बाशिंदे हैं सदान, आदिवासी- मुंडा, उरांव, खडि़या आदि। इनके खेत-खलिहान और गांव-घरों को न तो प्रकृति ने बनाकर दिया है, और न किसी सरकार या शासक ने। यहां के बाशिंदों ने अपनी हाड़तोड़ मेहनत से जंगल के बीच खाली स्थान पर, पहाड़ों के नीचे और नदियों के किनारे खेत, चांवरा, टांड़ आदि खेती करने के लिए बनाए। जंगल, पहाड़, नदी ही नहीं, जंगली जानवरों को भी इन्होंने बचाकर रखा। सदानों ने ‘कोड़कर’ खेत बनाए, मुंडाओं ने ‘खुटकटी’ व गांव बनाए और उरांवों ने ‘भुइहरी’ खेत बनाए। आदिकाल सेे ये अपने पुरखों के बनाए खेत-दोन को आबाद करते आ रहे हैं। तब भूमि (खेत-दोन) बनाने की छूट थी। 
 
सर्वोच्च न्यायालय  के फैसले के बाद फिर आदिवासियों और वनवासियों में सरकार के खिलाफ आक्रोश की चिंगारी नजर आने लगी है। वनाधिकार कानून को वन विभाग के द्वारा सही रूप में अनुपालन नहीं होने का आक्रोश तो पहले से आदिवासी समुदाय में मौजूद था। ऊपर से 20 फरवरी को दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आदिवासी समुदाय को आंदोलन की राह पर खड़ा कर रहा है।
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